मेरा पहला प्यार

पहला प्यार वो खुमार है जो हर ह्रदय में जितनी जल्दी पनपे समझो उसने उतना पहले जीना शुरू किया. दिव्या भी मेरे जीवन में ऐसे ही सुहानी हवा का झोंका थी. उसके बदन के हर हिस्से की खुशबू आज भी मेरी यादों में है………. आज भी जब उस पहली चुदाई का ख्याल आता है तो मेरा रोम  रोम रोमांचित हो जाता है.

मेरे घर के बगल मे शर्मा परिवार रहता है. परिवार में कुल 4 लोग हैं. 12वीं में पढने वाली शर्मा जी की लड़की दिव्या, उसका एक साल का छोटा भाई और उसके मम्मी-पापा. वो यहाँ दो साल से रह रहे हैं. हमारे परिवार की उनसे काफ़ी अच्छी पटती है। दिव्या अक्सर मुझसे सवाल पूछने मेरे घर पर आ जाती है। कभी-कभी मैं भी उसके घर चला जाता हूँ। एक बार दिव्या की मम्मी ने मुझसे कहा- बेटा क्या तुम इसको घर पर ट्यूशन पढ़ा दोगे?

मैं कुछ कहता इससे पहले उन्होंने कहा- अच्छा कितनी फ़ीस लोगे?

मैंने कहा- इसमें फ़ीस वाली क्या बात? ये जब चाहे मुझसे सवाल पूछ सकती है।

तो उन्होंने कहा- नहीं.. इस बार इसकी बोर्ड की परीक्षा है और मैं कोई लापरवाही नहीं चाहती.

मैंने कहा- ठीक है आंटी.. आप जो चाहे फ़ीस दे देना।

उन्होंने कहा- ठीक है, तो तुम आज से ही पढ़ाना शुरु कर दो।

फिर मैंने दिव्या से कहा- ठीक है,  दिव्या तुम शाम को 5 बजे तैयार रहना.

उसने कहा- ठीक है।

अब मैं आपको अपनी दिव्या के बारे में बता दूँ. मुझे यकीन है, उसके बारे में जान कर आप अपनी मुठ्ठ मारना नहीं भूलोगे। दिव्या देखने में एकदम माल लगती है. उसकी चूची एकदम मस्त हैं. मन करता की मुँह में भर लूं और बाहर ही ना निकालूँ। उसकी चूची का साइज 30
है। उस पर वो जब काली टी शर्ट पहन लेती है, तो अय.. हाय.. क्या लगती है?

अब मैं रोज दिव्या को पढ़ाने उसके घर जाने लगा। दिव्या भी मुझसे काफी घुल-मिल गयी थी. हम दोनों अब एक दोस्त की तरह हो गए थे. आपस में हम काफी मजाक भी करते थे. लेकिन कुछ दिनों से वो काफी खोयी-खोयी रहने लगी थी. कभी-कभी तो जब मैं उसे पढ़ाता रहता तो पाता कि वो लगातार मुझे देखते हुए कहीं और खोयी हुयी है. मुझे लगा शायद स्कूल में किसी पे इसका दिल आ गया है.

एक दिन जब मैं जब दिव्या से उसके पेपर के बारे में जानने उसके घर पहुँचा, तो उस वक्त स्कूल में उसकी मासिक परीक्षा चल रही थी। उस वक्त दोपहर के दो बजे थे. दिव्या लगभग 1:30 बजे तक स्कूल से आ जाती थी. मैंने घन्टी बजाई तो दिव्या ने दरवाजा खोला। वो अभी स्कूल यूनिफार्म में ही थी.

मैंने कहा- दिव्या मम्मी कहाँ हैं?

उसने कहा- सो रही हैं। आप दो मिनट रुकिए, मैं कपड़े बदल कर आती हूँ।

मैंने कहा- ठीक है.. मैं यहीं इन्तजार करता हूँ. जाओ जरा जल्दी आना.

वो चली गई, थोड़ी देर बाद मुझे पता नहीं क्या हुआ? मैं भी उसके पीछे हो लिया। मैंने दरवाजे के छेद से देखा, वो अपनी स्कर्ट उतार रही थी। अब वो सिर्फ़ ब्रा और पैन्टी में थी। क्या लग रही थी वो सफ़ेद ब्रा और पैन्टी में? मैं उसको इसी तरह कपड़े बदलते हुए देखे जा रहा था कि कब दरवाजा खुला, मुझे पता ही नहीं चला।

दिव्या ने कहा- क्या हुआ सर?

मैंने कहा- कुछ नहीं तुम्हें देर लग रही थी तो मैंने सोचा में ही देखता हूँ कि क्या बात है?

तो उसने कहा- झूठ मत बोलो!! मैं सब जानती हूँ. तुम मुझे कब से यहाँ खड़े हो कर देख रहे थे।

मैं तो ये सुन कर एकदम डर गया। मैंने सोचा आज तो मैं गया काम से.

मैंने कहा- तुम गलत समझ रही हो।

उसने कहा- मैं सब समझती हूँ, राजीव!!

फिर मेरा हाथ पकड़ते हुए उसने कहा- मैं तुमसे प्यार करती हूँ। मुझे अपना लो. मैं कब से तुम से ये बात कहना चाहती थी? पर डरती थी कि कहीं तुम इन्कार ना कर दो, पर तुमने जब इस तरह मुझे देख ही लिया है तो मुझे अपना बना लो।

मैंने सोचा चलो कि मुफ़्त में चोदने के लिये माल मिल रहा है तो मना क्यों किया जाए? उसके बाद हम एक दिव्य चुम्बन में खो गए। फ़िर थोड़ी देर बाद जब हमें होश आया तो वो मेरी बांहों में थी। उसकी साँस काफ़ी तेज चल रही थी। लेकिन साथ में ये भी डर था की अब कहीं उसकी मम्मी न ये सब देख ले तो हम शान्त हो गए।

मैंने दिव्या से पूछा- तुम्हारा पेपर कैसा हुआ?
उसने मुस्कुराकर कहा- एकदम ठीक!
मैंने कहा- तुम खाना खा लो.. हम शाम को मिलेंगे।

मैं उसे मुस्कुराकर आँख मारी और वहाँ से चला गया। घर जाते ही उसके नाम की एक मुठ मारी। मैं बहुत खुश था. शाम को पढ़ाने उसके घर पहुँचा तो देखा दिव्या एकदम तैयार बैठी थी। उस दिन उसने पीले रंग का सूट पहन रखा था। क्या लग रही थी वो उस सूट में? शायद उसे पता था कि आज उसके साथ क्या होने वाला है।

मैंने कहा- दिव्या तुम बहुत सुन्दर लग रही हो!

उसने मुझे चुम्बन करते हुये कहा- मम्मी बाहर गई हैं, कुछ देर में आयेंगी।

तो मैंने कहा- इरादा क्या है?

उसने कहा – जो तुम कहो।

इतना सुनते ही मैंने उसके होंठों को अपने होंठों से सटा दिया। मैंने बिना देर किए उससे उसके एक-एक कपड़े को अलग कर दिया। उसका एक-एक अंग मानो भगवान ने साँचे में ढाल कर बनाया हो। फ़िर हम बेड पर आ गए. थोड़ी देर तक हम 69 की पोजीशन में थे। मैंने अपनी उंगली से उसकी चूत की फ़ांकों को अलग किया और अपनी जीभ से चूसने लगा।

उसकी अंगुलियाँ मेरे बालों में फ़िरने लगीं और अपनी चूत उठा-उठा कर मुझसे चुसवाने लगी।

उसने कहा- अब बर्दाश्त नहीं हो रहा है, मुझे अपना बना लो। प्लीज़ मुझे मत तड़पाओ, डाल दो न अब..!

मैंने झटके से लंड उसकी चूत में डाल दिया। वो दर्द से चीख उठी, उसकी झिल्ली फट गई और उसकी चूत से खून बहने लगा। वो मछली की तरह छटपटा रही थी। मैं कुछ देर ऐसे ही थमा रहा। उसकी आँखों से आँसू निकल आए, मैंने अपने होंठ उसके होंठों से मिला दिए। उसका दर्द कुछ कम हुआ तो मैं धीरे-धीरे ऊपर-नीचे होने लगा। उसको अभी भी दर्द हो रहा था, लेकिन
दर्द के साथ मज़ा भी आ रहा था।

वो बिस्तर पर इधर-उधर होने लगी और उसका शरीर अकड़ने लगा, वो झटके खाने लगी और ‘आहें’ भरते हुए झड़ने लगी।
वो लगातार, ‘आआ… आअह… उई… ईई… ईईइ… आआ…’ कर रही थी।
उसकी ‘आआह ऊउई ईईई म्मम्म म्मह..’ की आवाजों से कमरा गूंज रहा था। अब उसका दर्द जाता रहा और वो भी मेरा साथ देने लगी, वो अपने चूतड़ उठा-उठा कर मेरा साथ देने लगी।
साथ ही वो सेक्सी आवाजें भी निकाल रही थी, “आअह हिस्स हम्म आह हाहा..” कर रही थी।
मेरा लंड बड़ी तेज़ी के साथ उसकी चूत को चोदे जा रहा था।

अचानक उसकी चूत में मेरे लंड पर दबाव बना लिया और उसकी सिसकारियाँ चीखों में बदल गईं- और जोर से.. ! और जोर से.. ! फाड़ दो मेरी चूत को.. आ
अह.. उई ईइ मा आ आ अह.. मैं मर गई..!

फ़िर हम दोनों ही एक साथ झड़ गए. मै उसकी चूत में झड़ गया। उस दिन मैंने उसे दो बार चोदा. फ़िर हम बाथरुम गए, एक-दूसरे को साफ़ किया और फ़िर पढाई करने लगे। अब जब भी मौका लगता है। हम चुदाई करते हैं। उस साल दिव्या अच्छे नम्बरों से पास हुई। उसने मुझे ‘धन्यवाद’ बोला।

मैंने कहा- ऐसे काम नहीं चलेगा.. तुम्हें पार्टी देनी पड़ेगी।

उसने कहा- ठीक है जानू! आज हम डिनर पर चलेंगे।

हमारा ये सिलसिला यूँ ही चलता रहा। मैंने कभी नहीं सोचा था कि दिव्या से अलग होना पड़ेगा, पर वो अशुभ दिन भी आया जब मुझे दिव्या से अलग होना पड़ा। उसके पापा का ट्रांसफर हो गया। वो जाने से पहले मुझसे लिपट कर बहुत रोई, लेकिन मैंने उसे समझया। आज भी अक्सर उसका फ़ोन आ जाता है और हम घंटों बात करते हैं। दिव्या से मैं बाद में मिला तो कैसे उसकी चुदाई की, यह मैं आप को फिर कभी सुनाऊँगा।

मैंने पहली बार कोई कहानी लिखी है मेरा हौसला जरुर बढ़ाईएगा, आप मुझे ईमेल कर सकते हैं।

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